कसनी ज़िमाम अच्छी नहीं हरगिज़

++ग़ज़ल ++(१२२२ १२२२ १२२२ १२२२ )
सुकून-ओ-अम्न पर कसनी ज़िमाम अच्छी नहीं हरगिज़
अगर पैहम है तकलीफ़-ए-अवाम अच्छी नहीं हरगिज़
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निज़ामत देखती रहती वतन में क़त्ल-ओ-गारत क्यों
नज़रअंदाज़ की खू-ए-निज़ाम अच्छी नहीं हरगिज़
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न रोके तिफ़्ल की परवाज़ कोई भी ज़माने में
कभी सपने के घोड़े पर लगाम अच्छी नहीं हरगिज़
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किसी को हक़ नहीं है ये कि ले क़ानून हाथों में
मगर सूरत वतन में है ये आम अच्छी नहीं हरगिज़
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क़ज़ा को घर बुलाना है तुम्हें तो ख़ूब पी लेना
वगरना मय है पक्की या है ख़ाम अच्छी नहीं हरगिज़
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शग़ल कोई ज़रूरी है मुहब्बत और पीरी में
शब-ए-ग़म और तन्हाई की शाम अच्छी नहीं हरगिज़
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ज़माना आ गया औलाद चाहे आज आज़ादी
किसी सूरत अब इन पर रोकथाम अच्छी नहीं हरगिज़
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कभी फ़तवा ये जारी कर तरक़्क़ी में इज़ाफ़ा हो
सियासत मज़हबी हर वक़्त इमाम अच्छी नहीं हरगिज़
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‘तुरंत’ इक बार जो ठानी कि छूना आसमाँ तुमको
तो मेहनत में किसी सूरत ख़िराम अच्छी नहीं हरगिज़
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गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत ‘ बीकानेरी |
२७/०६/२०१९
शब्दार्थ – ज़िमाम =नकेल ,पैहम =निरंतर,
खू-ए-निज़ाम=व्यवस्था की आदत ,
तिफ़्ल=बच्चा , ख़ाम=कच्ची
ख़िराम=मंद गति

         

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