“हवा”…

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किसी के आँख से चुरा लाई है काजल हवा ।
क्या-क्या गुल खिलाने लगी है ये आजकल हवा ।
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ज़मीं में बन जाती है सरसराहट की वज़ह ,
तो कभी-कभी तैरती है बनके बादल हवा ।
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किसी की मोहक खूशबू फ़िज़ा में बिखेर गई ,
औ मस्ती में लहराई पाँव की पायल हवा ।
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दीवानों की बस्ती बिंदास आना-जाना है ,
औ बिना हथियार के कर रही है घायल हवा ।
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कोई सगा रिश्ता है नदी-सागर से इसका ,
इक मुलाक़ात में सुन लेती है कल-कल हवा ।
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एक उम्मीद के सहारे टिकी चिराग़ की लौ ,
मगर आते ही इधर मचा जाती हलचल हवा ।
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हर वक़्त एक-सा नहीं होता , कुछ यूं बताती ,
इधर से उधर बिंदास घूम रही हर पल हवा ।
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कुछ बिखरते अहसास को देख अफ़सोस करती ,
वहीं चंद मज़बूत रिश्तों की है कायल हवा ।
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पूरे ज़हान में हर ठिकाने पर जा चुकी है ,
पर “कृष्णा” के शहर अब लहराई आँचल हवा ।
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