लगे परछाइयों का डर

****ग़ज़ल**** ( 1222 *4 )
है दिल में ख़ौफ़-ए-तारीकी लगे परछाइयों का डर |
हक़ीक़त में बड़ा होता सदा नाकामियों का डर | |
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हुआ जीना यहाँ मुश्किल अजब जम्हूरियत है ये
कभी दहशत कभी वहशत कभी दंगाइयों का डर |
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उजड़ जाती अगर बस्ती दिलों की इस ज़माने में
सताता उम्र भर रहता हमें वीरानियों का डर |
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किसी पागल की करतूतें करे जो इश्क़ इकतरफा
दिखे तेजाब से झुलसी हुई रानाइयों का डर |
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हुआ है दूर जब हमदम सताती हिज्र की रातें
तसव्वुर में भी छा जाता यहाँ तन्हाइयों का डर |
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इरादा इश्क़ का छोडो सभी कमजोर दिल वालों
अगर हर पल सताता है तुम्हें रुसवाइयों का डर |
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नहीं दुश्मन की चालों से कभी हम मात हैं खाते
हमें अहबाब से रहता सदा मक्कारियों का डर |
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हुकूमत के सियासी दांव खामोशी से चलते हैं
रहा है बादशाहों को सदा दरबारियों का डर |
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‘तुरंत ‘आवाम में दम हो न तानाशाह की चलती
बगरना मुल्क के लोगों को है मनमानियों का डर |
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गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत’ बीकानेरी

         

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