बहुत प्यारा मगर फिर भी सितमगर सा लगे

++ग़ज़ल++( २१२२ ११२२ ११२२ २२ )
है बहुत प्यारा मगर फिर भी सितमगर सा लगे
फूल होकर भी कोई जैसे कि पत्थर सा लगे
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ये ख़ुदादाद*हसीनों को है हासिल दौलत (*ईश्वर प्रदत्त )
उनका अंदाज़-ए-वफ़ा बिगड़े से अफ़सर सा लगे
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मान लें आप मुकम्मल है मुहब्बत का सफ़र
जब भी दिल आपका उसको उसी के घर सा लगे
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ढूंढ लेना है ज़रूरी दवा-ए-मर्ज़ कोई
इससे पहले कि हमें दर्द समंदर सा लगे
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भूख दौलत की कहाँ आई है ले इंसां को
रात दिन काम है घर भी किसी दफ़्तर सा लगे
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आतिश-ए-जिस्म बुझाना ही लगे प्यार उन्हें
रूह तक जाना तो नाकाम सिकंदर सा लगे
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मंज़िलें कैसी भी हों साथ निभा दे कोई
डूबते को तो कोई तिनका भी रहबर सा लगे
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जीना दुश्वार है नफ़रत की ख़लिश* से हर सू (*चुभन)
अब मरासिम तो हर इक खार के बिस्तर सा लगे
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फ़ायदा क्या है सजाने का ‘तुरंत’ अब पैकर*(शरीर )
तेरा किरदार अगर काँच के गौहर* सा लगे (*मोती )
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गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत’ बीकानेरी |
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२५/०४/२०१८

         

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