अपना पराया

अब जैसा ज़माना है ये ऐसा भी नहीं था
इन्सान को इन्सान से ख़तरा भी नहीं था

उस दर्द में भी मैंने गुज़ारे हैं शब-ओ-रोज़
जो दर्द मिरी ज़ात का हिस्सा भी नहीं था

जिस ख्वाब की ताबीर बताई गई मुझको
वो ख़ाब तो मैंने कभी देखा भी नहीं था

क्यों आँख से पलकों पे चले आए मिरे अश्क
शिद्दत से उसे आज तो सोचा भी नहीं था

अब मेरे लिए अश्क बहाता है भला क्यों
तूने मुझे दिल से कभी चाहा भी नहीं था

उलझन में बहुत दूर निकल आया था लेकिन
मैं मंज़िल-ए-मक़सूद से भटका भी नहीं था

क्यों तर्क-ए-ताल्लुक़ का मुझे देते हो इल्ज़ाम
ऐसा तो मेरा कोई इरादा भी नहीं था

मैं छू के उसे लज़्ज़त-ए-क़ुर्बत करूँ महसूस
वो पास मिरे इतना तो आया भी नहीं था

जो दर्द समझ पाया नहीं साद का अफ़सोस
वो शख़्स तो अपना था पराया भी नहीं था

अरशद साद रुदौलवी

         

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