“अपना बनाऊँ मैं”…

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क्या करूँ , किस-किस बात को किसको बताऊँ मैं ?
ख़ुद को याद रखूँ या उसको भूल जाऊँ मैं ?
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अब तक इस दिल में नापज़ीराई * का डर था ,
कुछ कहे यारा तो उसके क़रीब आऊँ मैं ?
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जो नज़र उठे मेरी तरफ़ तो दिखे कुछ ज़रर * ,
ज़रूरी नहीं , हरदम हाले-दिल सुनाऊँ मैं ?
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उसकी यादें लगे नसीमे-सहर * का झोंका ,
अहसास की खूशबू मिले , गले लगाऊँ मैं ।
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यूं बिछड़ना भी उसे बहुत आसां लगा मगर ,
मुड़कर फिर से देखे तो अपना बनाऊँ मैं ।
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कभी लगे बेवज़ह फ़रेबे-शौक़ * को पाला ,
मिले फ़रेबी , अपनी शौक़ से मिलवाऊँ मैं ।
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बातें दिल-फ़रेब तो अदायें थीं दिलरूबा ,
वज़ए-मुहब्बत * का ख़्याल कैसे दबाऊँ मैं ?
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चाक़े-जिग़र * को भी आज तलक सम्हाल रखा ,
वो देखना चाहे तभी तो ये दिखाऊँ मैं ।
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एक शक़ल है नगीने की तरह दिल में जड़ी ,
बेहद मुश्किल “कृष्णा”, इसे कभी हटाऊँ मैं ।
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* नापज़ीराई = स्वीकार न होना
* ज़रर = क्षति
* नसीमे-सहर = सुबह की हवा
* फ़रेबे-शौक़ = अभिलाषाओं का धोखा
* वज़ए-मुहब्बत = प्रेम-संबंधों का रख-रखाव
* चाक़े-जिग़र = छलनी हुआ दिल
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— °•K.S. PATEL•°
( 24/04/2018 )

         

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