अरसा गुज़र गया कोई गुफ़्तुगू नहीं

++ग़ज़ल++( २२१ २१२१ १२२१ २१२ )
अरसा गुज़र गया है कोई गुफ़्तुगू* नहीं (*वार्तालाप )
ख़त भी नहीं ख़बर नहीं है जुस्तजू* नहीं (*खोज )
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दरिया-ए-इश्क़ जो कि उफ़नता था थम गया
यूँ लग रहा है जैसे कि दिल में लहू नहीं
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ख़ामोश ताकते हैं दरीचा-ओ-बाम* को (*खिड़की और छत )
ये इल्म है वहाँ पे भी हालाँकि तू नहीं
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यादें हैं ख्वाब भी है तस्सवुर भी है तेरा
अफ़सोस बस यही है कि तू रू ब रू नहीं
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इतनी शराब पी तिरी आँखों के जाम से
ऐसा असर है आज मैं अहल-ए-सुबू* नहीं (*शराब पीने वाला )
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रिश्ता-ए-इश्क़ यार अब उधड़ा है इस क़दर
शायद कभी हयात में होगा रफ़ू नहीं
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क्यों सोगवार* हम रहें होनी तो हो गई (*दुखी )
थे दोस्त कल भी आज भी हम तो अदू* नहीं (*दुश्मन )
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दिल को सुकून है यही ऐ कल के हमसफ़र
अब तक तिरी नज़र में हूँ बे-आबरू नहीं
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बर्फ़ाब* से हुए सभी अरमान अब ‘तुरंत’ (*बर्फ से ठंडा किया पानी )
इस ज़ीस्त में बची है कोई आरज़ू नहीं
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गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत’ बीकानेरी.
03 /05 /2018

         

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