“असर बाकी है”…

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मेरी ज़िंदगी में कुछ फासले पे असर बाकी है ।
लफ़्ज़ निकले थे यहीं कभी , उनकी क़दर बाकी है ।
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न जाओ इतनी जल्दी मेरे ख़्वाबों से निकलकर ,
सदा बताना ठीक नहीं अभी तो सहर बाकी है ।
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हसरतें न जाने कबसे इंतज़ार में हैं बैठे ,
मगर अच्छे पलों की आनी अभी ख़बर बाकी है ।
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मेरी वफ़ा पे कोई ऊँगली उठे तो मान लूँ ,
वफ़ा के बदले दिख जाए कोई नज़र बाकी है ।
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यूँ तो ज़िंदगी में सभी साथ हैं मेरे कहते ज़रूर ,
मगर लगता है मेरे साथ कोई लहर बाकी है ।
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मैंने तो उमर भर भटकने का मजा नहीं माँगा ,
बताओ ज़रा औ कितने ग़मों का पहर बाकी है ?
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इश्क़ का क्या ईनाम मिला है मालूम नहीं उधर ?
औ चाहत का परिणाम आना भी इधर बाकी है ।
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अभी तो चंद मेरी ग़ज़लों में समेटा है तुझे ,
आगे मेरी किताबों में तेरा सफ़र बाकी है ।
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ज़िंदगी , इंसान औ मोहब्बत… तीनों ही बेवफ़ा ,
बस समय पर “कृष्णा” इनसे मिलना क़हर बाकी है ।
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— °•K.S. PATEL•°
( 19/06/2018 )

         

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