इस ज़ीस्त की असास थी

इस ज़ीस्त की असास थी जाने कहाँ गयी
आँखो में जो ये प्यास थी जाने कहाँ गयी

मिलता नहीं है ख़ुद का भी साया कहीं पे अब
इक रौशनी जो पास थी जाने कहाँ गयी

वो दिन बहुत हसीं था कि पहलू-नशीं थे ग़म
वो शाम कितनी ख़ास थी जाने कहाँ गयी

सब कुछ तो लुट चुका है फ़क़त जिस्म है बचा
जीने की जो ये आस थी जाने कहाँ गयी

एहसास दर्द का भी अब होने लगा है कम
इस रूह की जो यास थी जाने कहाँ गयी

जाने कहाँ कहाँ से खुला है मेरा बदन
इक शर्म ही लिबास थी जाने कहाँ गयी

इतना कसैला हो चुका है अब ज़बाँ का स्वाद
लहजे की जो मिठास थी जाने कहाँ गयी

-सचिन मेहरोत्रा

असास – बुनियाद
यास – मायूसी

         

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