उदास आंखे

उदास आँखों में मंज़र उदास हैं कितने
उतर के जिस्म में ख़ंजर उदास हैं कितने

हमारी रूह में ये इज़्तिराब है कैसा
ख़्याल-ए-यार के लश्कर उदास हैं कितने

है इन्क़िलाब सा बरपा दिलों में फुरक़त से
तेरी जुदाई से दिलबर उदास हैं कितने

तलाश-ए-रिज़्क़ में चादर वो धूप की ओढ़े
ग़रीब लोग यहां पर उदास हैं कितने

तिरी ये तल्ख़-नवाई का कुछ नहीं है गिला
मगर ये ख़ाब के महवर उदास हैं कितने

जो भूल जाते हैं उड़ने के बाद दुनिया को
वही उतर के ज़मीं पर उदास हैं कितने

मुहब्बतों की कमी कुछ नहीं फ़क़ीरों में
मगर जहां में सिकंदर उदास हैं कितने

छलकते रहते हैं औरों के हाथ में लेकिन
हमारे हाथ में साग़र उदास हैं कितने

अरशद साद

         

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