“उसका क्या…?”

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न पूछो कुछ सवाल , दिल पे जाकर चुभती उसका क्या ?
नज़र ज़ालिम भी उसी पे जाकर ठहरती उसका क्या ?
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रोशनी से कैसे शिकायत न होगी भला बताओ ?
मेरे अलावा हर आँगन रोशन करती उसका क्या ?
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जान की सुरक्षा हेतु सारे उपाये किये हैं मगर ,
पल में नज़र हटती औ दुर्घटना घटती उसका क्या ?
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क्या-क्या जतन किये थे कि अब ख़्वाबों में मिल आयेंगे ,
मगर हर-एक रात बिना कुछ कहे ढलती उसका क्या ?
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बहुत आसानी से सच साबित कर दिया है झूठ को ,
मगर इस दौरां लफ़्ज़ आपस में उलझती उसका क्या ?
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दिल को समझा लिया था कि नहीं है मोहब्बत उससे ,
मगर कुछ पलों में गंगा-यमुना बहती उसका क्या ?
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माना कि आकांक्षाओं पर नियंत्रण बेहद ज़रूरी ,
मगर “कृष्णा” इधर ये अतृप्त प्यास बढ़ती उसका क्या ?
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— °•K.S. PATEL•°
( 21/05/2018 )

         

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