करवटें बदल कर हमने तमाम रात काटी

जबसे उनके ख्वाबों में अपनी नींदें बाँटी
करवटें बदल कर हमने तमाम रात काटी

बेचैन सिलबटों में जब उनकी याद जागी
तस्वीर उनकी सिरहाने रखके रात काटी

चाँद पूरे शाबाब पे जब आसमान में आया
उसमें तेरा अक्स देखकर तन्हा रात काटी

बादल उमड़-घुमड़ कर मुझे सताता रहा
तेरी वस्ल में भीग कर हरजाई रात काटी

हर लम्हें में बीतता सा गया मेरा एक सदी
वक़्त के पैरों में ज़ंज़ीर डालकर रात काटी

सलिल सरोज

         

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