पीता हूँ रात उनींदी आँखों से

पीता हूँ रात उनींदी आँखों से तुझमें जीने के लिए
अंधेरा मिलाता हूँ ज़्यादा,गम ज़रा नम पीने के लिए

गिरती उठती ,ये झूमती पलकें तुझे ढूंढ रहीं हैं
नींद में पिरोता हूँ उम्मीद कितनी,इन्हें सीने के लिए

ख्वाबों में भी तुझको ढूंढता हूँ मैं ओ चाहत मेरी
बंद आँखों से बहते आँसू,बस यही कहने के लिए

रात भर करवटें बदलती मुझको इस गफ़लत में
बिस्तर ना रह जाए कम जगह तेरे होने के लिए

पल-पल रिस रहा हूँ मैं, ना आ जाये विरही सवेरा
आजा ये रात मनाई है मैंने ,हमारे खोने के लिए

इस दिल में ना रहेगा कुछ यक सिवा तेरे
कर दूँगा धड़कने भी खाली तेरे रहने के लिए

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… युवराज अमित प्रताप 77
.. दर्द भरी शायरी – ग़ज़ल

         

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