काग़ज़ पर बिछा जा रहा हूँ मैं

ना चाहत शोहरत की ना शब्द जाल बना रहा हूँ मैं
खुद में हूँ गुम बस और चला जा रहा हूँ मैं

आप हैं पढ़ने वाले कलम रही मुझे लिखने वाली
नहीँ रहता होश कागज़ पे कब बिछा जा रहा हूँ मैं

आती है खुशबू ए सुकून जिधर से भी ज़ेहन में
घायल उम्मीद के कदम उधर उठा रहा हूँ मैं

ठहराव है ये जिद़गी का के अब चली जिद़गी है
तजुरबों को अच्छा , खुद को बुरा बता रहा हूँ मैं

रोता आया पीठ में खाये जिन जख्मों को
( देखिए_असर_आपका )
भीगी पलकों से मुस्कुरा , उन्हें सजा रहा हूँ मैं

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… युवराज अमित प्रताप 77
.. दर्द भरी शायरी – ग़ज़ल

         

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