“कुछ क़सक़ ऐसा भी”…

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बेरंग ज़िंदगी को रंगने का , कुछ क़सक़ ऐसा भी ।
रिश्तों के दरम्यां गुज़रने का , कुछ क़सक़ ऐसा भी ।
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सुबह से लेकर शाम तक मानो एक जैसा मंज़र ,
ख़्वाहिश से किस तरह उबरने का , कुछ क़सक़ ऐसा भी ।
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इक तलाश रही कि जी को कुछ सक़ून मिल जाए मगर ,
न दिख पाया क़रार ठहरने का , कुछ क़सक़ ऐसा भी ।
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गजब की क़शिश है , ये बात कहना भी थोड़ा मुश्किल ,
वक़्त-बेवक़्त हाय बिछुड़ने का , कुछ क़सक़ ऐसा भी ।
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कुछ अज़ीब-सा लगता है मगर ये भी बिल्कुल सच है ,
देखता कोई खेल डरने का , कुछ क़सक़ ऐसा भी ।
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कुछ अच्छा होता तो कुछ बुरा भी हो जाता अक्सर ,
नज़ारा मत हो फिर बिखरने का , कुछ क़सक़ ऐसा भी ।
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अब इस दौर में कहो , भला क्या कर सकता है “कृष्णा” ?
इंतज़ार हालात सुधरने का , कुछ क़सक़ ऐसा भी ।
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— °•K.S. PATEL•°
( 18/10/2018 )

         

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