कुछ खार यूँ चुभे

खुशियों के चन्द फूल सँभाले नहीं गये|
कुछ खार यूँ चुभे कि निकाले नहीं गये|
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तेरा कुसूर क्या है तू ठहरा जो आइना,
मेरे ही मुँह से दाग ये काले नहीं गये|
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जर्रे मकान के तो ये रोशन हुए सभी,
लेकिन दिये तले ही उजाले नहीं गये|
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तुमको गुरूर तैर के साहिल पे आने का,
हम भी तो मौज से ही उछाले नहीं गये|
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पर्दे हटा लिए हैं नुमायाँ है हर उजू,
लेकिन अभी जुबान से ताले नहीं गये|
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करता न आदमी पे भरोसा ये आदमी,
कुत्ते यहाँ ‘मनुज’ यूँ ही पाले नहीं गये|

         

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