कैसी है दिल्लगी

गम को रखा सँभाल करीने से इस तरह|
अपने लगा लिया है जो सीने से इस तरह|
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ढूँढूगा अब नहीं जो मुकद्दर में ही नहीं,
ये ही बता रहा था तू महीने से इस तरह|
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ये लब नहीं किसी के,है बोतल शराब की,
मुझको नहीं तू रोक भी पीने से इस तरह|
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तेरी खुशी यही है तो हर दिन मरूँगा मैं,
जी भी तो भर गया मेरा जीने से इस तरह|
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कैसी है दिल्लगी मुझे दरिया में फैंककर,
क्यों फिर पुकारता है सफीने से इस तरह|
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उल्फत न अब मिलेगी ये मुझको यहाँ पता,
होती न पर गुजर मेरी कीने से इस तरह|
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धागे तो पास मेरे तसल्ली के हैं मगर,
सिलता न दिल मनुज मेरा सीने से इस तरह|

         

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