क्या लिखू

पहले उजडा हुआ जहां लिक्खूँ
या मैं गुरबत की दास्तां लिक्खूँ

ज़ख्मी ज़ख्मी है जिस्म का हिस्सा
दर्द बाकी का अब कहाँ लिक्खूँ

दर्द बचपन से आज तक कैसे
धीरे धीरे हुवा जवाँ लिक्खूँ

मेरे चारो तरफ ही थे दुशमन
किसको को अपना मैं महेरबाँ लिक्खूँ

पाओं ज़ख्मी है दूर मंजिल है
रास्तों को धुवाँ धुवाँ लिक्खूँ

कतरा कतरा लहू इन आँखों का
मैं समेटूं इन्हे जुबा लिक्खूँ

बहते नफरत के आज दरिया को
हर किसी में रवाँ दवाँ लिक्खूँ

जिसमें खुशियां कयाम ही न करें
घर या खाली उसे मकां लिक्खूँ
दिल के अन्दर तो शोर अब भी है
कैसे खुदको को मैं शादमां लिक्खूँ

अरशद साद रूदौलवी

         

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