“ज़िंदगी तेरे नाम किया”…

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न तूने कोई वादा किया , न कुछ ऐसा काम किया ।
फिर भी ये शख़्स अपनी ज़िंदगी तेरे नाम किया ।
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बाजी बचपन के प्यार का हारना गंवारा नहीं ,
ये वक़्त की ज्यादती , तेरे हिस्से अंज़ाम किया ।
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मुझे आ गया यकीं-सा कि तू ही मेरी मंज़िल मगर ,
मेरी ज़हां से दूर तूने और कहीं क़याम * किया ।
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विचार की डोर लफ़्ज़ों से इस क़दर है उलझे हुए ,
फिर भी हर एहसास ने हर कोशिश सरे-आम किया ।
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तुझे लगता जैसे तेरी ज़िंदगी का मेहमान मैं ,
मगर तेरे हिस्से अपनी सारी सुबहो-शाम किया ।
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अनगिनत चेहरे में मौका मिले तो तौलना मुझे ,
जैसा हूँ वैसा हर घड़ी तुझे मैंने सलाम किया ।
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ये इश्क़ का खेल आफ़त , इसपे न चले दिल का ज़ोर ,
फिर क्यूं जानबूझकर “कृष्णा” ये हरकत तमाम किया ?
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* क़याम = निवास
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— °•K.S. PATEL•°
( 25/04/2018 )

         

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