“जाने क्यूँ अश्क़”…

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अनसुलझे एहसास को कई क़िश्तों में अदा कर गया ,
अनपढ़ न था फिर क्यूँ नज़र की भाषा पढ़ने से डर गया ?
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पानी की एक बूँद के लिये ज्यादा तरस गया था वो ,
बारिश आते ही पूरा घर सागर के जल से भर गया ।
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उसके नेक इरादे हालाँकि थे बहुत मज़बूत लेकिन ,
जाने क्यूँ अश्क़ आँखों से निकलकर असमय ही झर गया ।
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सुना था सागर से गहरा होता है प्यार का संबंध ,
मगर मिला कुछ भी नहीं , खाली हाथ आया जिस दर गया ?
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सच्ची खुशी पूरे जहां में ढूँढने पर भी मिली नहीं ,
आखिर मुस्कान पाने के लिये वो अपने ही घर गया ।
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हिसाब करना क्या कहें बिल्कुल भी नहीं आया है उसे ,
जिसने दिया ग़म उसे , वो उसके कष्टों को ही हर गया ।
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सारा शहर हो गया “कृष्णा” उसके ज़नाज़े में शरीक़ ,
तन्हाइयों के ख़ौफ़ से जो शख़्स बेवज़ह ही मर गया ।

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