तन्हा यूँ ज़माने में मुझे छोड़ दिया क्यों

++ग़ज़ल++(२२१ १२२१ १२२१ १२२ )
तन्हा यूँ ज़माने में मुझे छोड़ दिया क्यों
धागा वो मुहब्बत का सनम खींच लिया क्यों
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हमदर्द नहीं थे तो शिफ़ा ज़ख़्म की क्यों की
बनने को था नासूर वही ज़ख़्म सिया क्यों
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आग़ाज़-ए-मुहब्बत में कहा प्यार नहीं है
फिर आपके रुख़सार पे दिखती थी ज़िया क्यों
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मौके तो मिले थे कई जब वस्ल के जानाँ
फिर ज़ह्र-ए-जुदाई को यूँ जीतेजी पिया क्यों
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कहते थे सभी झूठ हैं उल्फ़त के तराने
फिर प्यार की इक़रार की करते थे रिया क्यों
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ता-हश्र निभाएंगे मरासिम ये कहा फिर
बेवक़्त सनम मौत से गठजोड़ किया क्यों
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सुनते हैं कि ये वक़्त भुला देता सभी ग़म
फिर आप की यादों का सनम जलता दिया क्यों
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इक संग की मानिंद बना आज मेरा दिल
हैरत है बिना आपके अब तक मैं जिया क्यों
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मज़हब ने खड़ी कर दी ‘तुरंत’ इश्क़ में दीवार
इंसान तो सब एक से फिर सुन्नी-शिया क्यों
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गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत’ बीकानेरी |
27 /03/2018
शिफ़ा =चिकित्सा ,ज़िया=चमक
रिया =नुमाइश /दिखावा, ता-हश्र=क़यामत तक
मरासिम=प्रेम व्यवहार

         

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