तुझसे बिछड़ कर ये बात समझ में आई

तुझसे बिछड़ कर ये बात समझ में आई
सुबहों-शाम और दिन-रात समझ में आई

जिस्म जब थक के सोया था बिस्तर में
हँसी-मज़ाक व मीठी बात समझ में आई

मैं ढूँढता ही रहा तुझे हर शय,हर मंज़र में
तेरी-मेरी पहली मुलाकात समझ में आई

दरो-दीवार भी तेरा इंतज़ार करते रहते हैं
बुज़ुबान चीजों की बात समझ में आई

अब भी हवा तेरी खुशबू बनके आती है
तेरी यादों की मीठी सौगात समझ में आई

सलिल सरोज

         

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