दर्द अपना छिपा रहा हूँ मैं

दर्द अपना छिपा रहा हूँ मैं
गम को नग़मा बना रहा हूँ मैं

मैं हूँ वाक़िफ़ हर एक चेहरे से
मुद्दतों आईना रहा हूँ मैं

काग़ज़ी फूल भी सदा महकें
उनमें ख़ुशबू बसा रहा हूँ मैं

अब तो कामिल मिरी मुहब्बत है
जान अपनी लुटा रहा हूँ मैं

दिल में जीने की अब नहीं ख़्वाहिश
ज़िंदगी बस बिता रहा हूँ मैं

जाने वाला तो दूर जा निकला
अब सदा क्यों लगा रहा हूँ मैं

मुझको मालूम है वो झूटा है
जिसको सच्चा बता रहा हूँ मैं

बात मानी थी आपकी फिर से
ज़ख़्म फिर साद खा रहा हूँ में

अरशद साद

         

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