दीप उम्मीद का जाना था बुझा कर जाते

दीप उम्मीद का जाना था बुझा कर जाते
क़त्ल अरमानों का तुम कर के सितमगर जाते

जज़्ब होते न अगर अश्क मिरे दामन में
बन के यह अंजुम व महताब फ़लक पर जाते

यह भी अच्छा ही हुआ मौत चली आई खुद
वरना फुरकत में तिरी वैसे भी हम मर जाते

जाम आँखों से मुझे तूने पिलाया वरना
तश्नगी इतनी थी पी आज समुन्दर जाते

ग बैठे हैं फ़सीलों पे शिकारी बन कर
कैसे इस पार से उस पार कबूतर जाते

कुछ सुकूँ मिलता थके हारे हुवे आते घर
कर के खुशियों से ही गुलज़ार अगर घर जाते

यह तो अच्छा हुआ तन्हाई मयस्सर न हुई
वरना अशकों से कई दरया मिरे भर जाते

साद पर होती इनायत न तड़पता दिल भी
साथ अपने वो अगर याद भी लेकर जाते
ارشـــد سعـــد ردولـــوی
अरशद साद रुदौलवी

         

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