नगमा ए दिल

ग़ज़ल
.नगमा ए दिल

मेरी बर्बादी का जश्न मना के लौट रहे हो।
अच्छा है कुछ प्यार जता के लौट रहे हो।

फक्र है तेरी बेवफा ए मोहब्बत पर,
अपनी मोहब्बत दफना के लौट रहे हो।

जरा सुन किसी और से न खेलना इस तरह,
जिस में मुझे तुम मिटा के लौट रहे हो।

ये दुनिया प्यार,यकीन पर बसती है सच में,
और तुम तो इनको ठुकरा के लौट रहे हो।

बड़ी मुश्किल से एक घर बनता है यहाँ,
तुम तो पूरी बस्ती जला के लौट रहे हो।

चलो प्यार,धोखा तेरी फितरत ही सही,
किसी एक को पूरा निभा के लौट रहे हो।

खुश है दिल मेरी आखिरी ख्वाहिश पर,
कम से कम चेहरा दिखा के लौट रहे हो।

अरे तेरी आँखों में आँसू की धार कैसी,
हर सितम् पर तो पर्दा गिरा के लौट रहे हो।

ऐ मुसाफिर तेरी आखिरी रजा क्या है?,
क्यों अपने दर्द को बता के लौट रहे हो।।

रोहताश वर्मा”मुसाफिर”

         

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