परवाज नहीं होती

अक्सर ही ये महफिल भी हमराज नहीं होती|
दिल टूट भी जाता है आवाज नहीं होती||
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तूने भी तो दिल आखिर चाहत की खता की है,
यूँ ही न कभी  किस्मत नाराज नहीं होती
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टकराके हमेशा बस शीशा ही बिखरता है,
तबियत भी ये पत्थर की नासाज नहीं होती|
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नजरों में फलक लेकिन तकदीर बुरी निकली,
पर टूट गये अपने परवाज नहीं होती|
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मत पूछ मनुज कुछ भी इल्जाम वो मढ़ देंगे,
बेमानी बहानों की मोहताज नहीं होती|

         

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