पिघल जाओगे

सूरत-ए-मोम किसी रोज़ पिघल जाओगे
इस तरह आग से खेलोगे तो जल जाओगे

ख़्वबा में भी ना ये सोचा था मिरी जान-ए-वफ़ा
वक़्त मुश्किल जो पड़ा तुम भी बदल जाओगे

मानता हूँ कि मिरी ज़ात है इक शम्मा हक़ीर
तुम भी सूरज हो मगर शाम को ढल जाओगे

मैं कोई राह का पत्थर नहीं हूँ जिसको तुम
अपनी ठोकर से हटाओगे निकल जाओगे

उम्र-भर आपको अफ़सोस नहीं करना है
वक़्त रहते हुए गिर आप सँभल जाओगे

कैसे पहुंचोगे बताओ तो सही मंज़िल तक
रास्ते में ही अगर आप फिसल जाओगे

आईना वक़्त की सूरत तो भयानक है बहुत
देख लोगे जो उसे साद दहल जाओगे

अरशद साद रूदौलवी

 

         

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