“प्रीत महकती रही”…

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वो याद आये तो सदा दिल से दुआ निकलती रही ।
सेहत ख़राब सुनकर तड़प रह-रहकर सुलगती रही ।
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ज़रा-सा छींक भी दे , इधर दिल घायल हो जाये ,
उधर वो कुछ भी तो न हुआ , विश्वास से कहती रही ।
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कदम-कदम पर पूछने को तैयार हैं कई सवाल ,
अक़्सर यादों से परे कोई ख़्वाहिश मचलती रही ।
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ये दूरियाँ भी एक पल में मानो हो गईं गायब ,
सुरीली आवाज़ कानों में रात भर खनकती रही ।
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बड़ा अजीब लगता कि दूर होकर भी ज़ुदा नहीं हम ?
अनछुई साँस है जो दोनों छोर से गुजरती रही ।
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कभी कोई शिक़ायत न हो कि दुआ नहीं करते इधर ,
सुन , ज़िस्म के मंदिर में शब-भर घंटियाँ बजती रही ।
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एक लफ़्ज़ ने मानो तलाश को ही ख़त्म कर दी हो ,
“कृष्णा” की ज़िंदगी में अब जाकर प्रीत महकती रही ।
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— °•K.S. PATEL•°
( 24/05/2018 )

         

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