“फ़ना हो गया”…

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उसका ख़्याल मेरे लिए बस वाज़िब दवा हो गया ।
कैसा मरज़ है इश्क़ का , धीमा-सा नशा हो गया ।
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कोई कसम खाकर कहे तो अब मान लूँ मैं इधर ,
वादा तोड़ने का तरीका कैसे वफ़ा हो गया ?
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बतलाना ज़रूरी नहीं है चाक़े-ज़िग़र को उसे ,
जाने वो ज़रा किसलिए अनचाहा ख़ता हो गया ?
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दिल से खेलने का फ़साना हर तरफ़ देखो अभी ,
चाहत का मजा आजकल बस मानो सजा हो गया ।
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अंज़ामे-इश्क़ का नहीं दिखता इधर परवाह अब ,
देना मत मशवरा , ग़मों का पल अब मजा हो गया ।
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आशिक़ का सफ़र कब तलक आसां , सोचना भी कठिन ,
सुन लेना कभी रूकता दम आखिर फ़ना हो गया ।
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अपना हाल कैसा बनाया “कृष्णा”, ज़रा देख लो ,
कोई बहुत खुश है इधर तो कोई ख़फ़ा हो गया ।
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— °•K.S. PATEL•°
( 29/06/2018 )

         

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