बूढ़ी आंखों की नमी को पोछता अब कौन है

बूढ़ी आंखों की नमी को पोछता अब कौन है।
बाग ये किस ने लगाया सोचता अब कौन है।।

फूल डाली पे खिला यूं ही नहीं है दोस्तों।
खून से सींचा गया हैं,जानता अब कौन है।।

वक्त से आगे निकलना हर किसी की चाह अब।
बेबसों को पीछे मुड़ कर देखता अब कौन है।।

पर निकल आये हैं अब तो उड़ रहे हैं रात दिन।
पास आ कर हाल मां का पूछता अब कौन है।।

गुंगे बहरे हो गये हैं आज के इंसान भी
जुर्म होते देख कर भी बोलता अब कौन है।।
©अंशु

         

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