बेक़रारी

बदहवासी है बेक़रारी है
आज की रात सख़्त भारी है
सिर्फआवाज़-ओ-बेनुमाई है
यार कैसी तिरी अय्यारी है
आह है , दर्द है , उक़ूबत है
ये फक़त दास्ताँ हमारी है
चाहत-ए-वस्ल का ये आलम है
आखिरी ग़ुस्ल की तैयारी है
‘दीप’ लब खोल दूँ,मगर सोचूं
इसमें बेपर्दगी तुम्हारी है
भरत दीप

         

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