बेवफा मोहब्बत

ग़ज़ल

रुठकर हमसे यूँ, सताने की सोच रहे हो।
दूर होकर भी, तड़फाने की सोच रहे हो।

वैसे भी कुछ नहीं रखा जा मोहब्बत में,
अक्सर कि तुम,भूलाने की सोच रहे हो।

फरेब है,धोखा है सब में है ये छलावा,
बाखूब जानता हूँ,मिटाने की सोच रहे हो।

हम डूब गए वैसे भी आँसुओं के सागर में,
किस हद तक और,रुलाने की सोच रहे हो।

हवा के साथ हम बेफिक्र उड़ते रहे हैं,
फिर भी राख कर,उड़ानें की सोच रहे हो।

आजकल ये नजरें किसी ओर की है शायद,
तभी तो हमें यूँ , हटाने की सोच रहे हो।

जा ओ “मुसाफिर” तेरी चाहत बदल गई,
किस छोर पर अब,ठिकाने की सोच रहे हो।।

रोहताश वर्मा “मुसाफिर”

         

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