मरज़ की दवा

तुम मरज की मिरे दवा कर दो
या मिरा ज़ख़म और हरा कर दो

मैं तो पत्थर हूँ राह का मुझको
यूं तराशो कि देवता कर दो

चोट देकर पुराने ज़ख़मों को
दिल के हर दर्द को नया कर दो

याद पहुंचे ना मेरे सीने तक
दरमियाँ उतना फ़ासिला कर दो

बद-गुमानी की धूल है जिस पर
तुम इसी दिल को पारसा कर दो

दोनो जानिब ही लोग हैं अपने
जो मुनासिब हो फ़ैसला कर दो

अपने दिल से निकाल दो लेकिन
आशयां कोई साद का कर दो

अरशद साद रुदौलवी

         

Share: