मुद्दतों का दर्द

गजल
तुम्हें और क्या ये सुनाऊँ मैं,
मुझे आफतों से यही मिला|
मेरा एक दिन का न दर्द ये,
मुझे मुद्दतों से यही मिला|
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मेरे रुख पे था किसी चांद की,
वो तो चाँदनी का गुबार था|
हूँ बुझा बुझा जो मैं खाक सा,
मुझे जुल्मतों से यही मिला|
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वो मिला नहीं तो करूं भी क्या,
मैने कोशिशें तो हजार कीं,
तनहाइयों में यूँ घुट रहा,
मुझे किस्मतों से यही मिला|
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वो हसीन से मेरे ख्वाब थे,
कभी जिन्दगी से भी प्यार था|
मैं पुकारता हूँ कजा को अब,
मुझे चाहतों से यही मिला|
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मैंने बुजुर्गों से सुना था ये,
कि हरिक सफर में हैं मन्जिलें|
चुभे खार ही कदमों में बस,
मुझे रासतों से यही मिला|
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ये करार भी न मिला “मनुज”,
न शराब में न सबाब में |
वो अमीर हैं मैं गरीब हूँ,
मुझे शोहबतों से यही मिला|

         

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