मुसाफ़िर बन गया हूँ!

गजल

आईने सी टूटी हुई तस्वीर बन गया हूँ!
रूठे हुए भाग्य की लकीर बन गया हूँ!

अब कहाँ बसेरा इस बेबस इंसान को,
दो गज की मिली जागीर बन गया हूँ!

कैसे लगे निशाना अब अपने लक्ष्य पर,
टुकड़े हुए कमान का तीर बन गया हूँ!

बढ़ नहीं सकता दो कदम आश लिए ,
खुद अपने पाँव की जंजीर बन गया हूँ!

जैसे चाहे अब खरीद सकते हो मुझे ,
चंद पैसों में बिके वो जमीर बन गया हूँ!

सब को राह दिखाता रहा हूँ मैं यारो,
और खुद भटका “मुसाफ़िर ” बन गया हूँ!!

रोहताश वर्मा “मुसाफ़िर “

         

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