मुस्कुराने की पगार

उन्हें खयाल में अक्सर उतार लेते हैं |
यूँ साथ साथ भी रातें गुजार लेते हैं |
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न हैसियत है खुशी को खरीद लें लेकिन,
दुकान ए ख्वाब से फिर भी उधार लेते हैं |
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हुनर मिला है हमें तो ये ठोकरों से ही,
जो टूटता है ये दिल तो सँवार लेते हैं |
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लो हिचकियों की दवा भी तो ढूँढ ली हमने,
लबों से नाम उन्हीं का पुकार लेते हैं |
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बनाते हम भी यूँ आखिर हयात को दुल्हन,
बहाके अश्क गमों को निखार लेते हैं |
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शराब का है असर या हुए हैं हम पागल,
जो बज्म ए रक्स में ठुमके भी मार लेते हैं |
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हमें वो प्यार करेंगे दिखे ‘मनुज’ मुश्किल,
जो मुस्कुराने की भी तो पगार लेते हैं |

         

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