“ये मकान उसका था”…

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बात बस ये जाना , मेरे पास कुछ सामान उसका था ।
रहे कोई कैसे मेरे दिल में , ये मकान उसका था ।
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पता है उसे तन्हाई से मुझे बेहद डर लगता है ,
तन्हा छोड़ जाये या फिर नहीं , बस ईमान उसका था ।
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इश्क़ का बँटवारा रजामंदी से होगा भला कैसे ?
उसकी दुनिया में वो बेहद खुश , ये फ़रमान उसका था ।
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बहुत रोका मगर रोक नहीं पाया चाहत के पलों को ,
अज़ीब-सा लगेगा मगर शरीर मेरा , जान उसका था ।
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मोहब्बत के ज़हर को धीरे से चखकर देख रहा मैं ,
हश्र आगे क्या होगा , मानो ये इम्तिहान उसका था ।
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मौसम के जैसे भला कैसे बदल लूँ अपना हमसफ़र ?
ज़ेहन में मुस्तैदी के साथ बसा मुस्कान उसका था ।
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अब ये भी मुमकिन नहीं है “कृष्णा” हर लफ़्ज़ बयां ही हो ,
पर ये भी जानना ज़रूरी , क्या-क्या अरमान उसका था ?
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— °•K.S. PATEL•°
( 13/09/2018 )

         

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