रहमतें भी नहीं सदा भी नहीं

रहमतें भी नहीं सदा भी नहीं
हमने चाहा था जो मिला भी नहीं

अय बशर तेरी क्या हुई सूरत
आदमी भी नहीं ख़ुदा भी नहीं

रोज़ तकता रहा हमे इक टक
चाँद ने कुछ मगर कहा भी नहीं

रात गुज़रेगी अब अँधेरो में
पास अपने कोई दीया भी नहीं

वो तो रहता है ख्यालों में बस
साथ में भी नहीं जुदा भी नहीं

लोग आयेगे फिर जगाने उसे
वो यही सोचकर उठा भी नहीं

रूह को चैन अब कहां मिलता
वक्त-ए-आख़िर अभी हुआ भी नहीं

-सचिन मेहरोत्रा

         

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