रोको उनको सब आग है, धुँआ हम थे

ज़िन्दगी में किसी के आशियाँ हम थे
कभी ऐसे किसी के मेहरबाँ हम थे

हालातो से अपने वो जूझता रहा
उसकी जिंदगी की दास्ताँ हम थे

बदगुमानी उसने की औरों के साथ
ज़िन्दगी में सलीके की जुबां हम थे

ये तख़्तों ताज हुकूमत कब तलक
वो सब भी वहाँ है जहाँ हम थे

नफ़रतों की भीड़ में कहीँ गुम हो गया
वो बढ़ते भाईचारा का गुमाँ हम थे

कभी एक मरता है वो दूजा मारता है
रोको उनको सब आग है धुआँ हम थे

-आकिब जावेद
“कागज़ दिल से”

         

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