.खता करके रोया

मुझे अपने दिल से जुदा कर के रोया
सितम-गर यही इक ख़ता कर के रोया

उदासी की चादर में मलबूस हो कर
दरो बाम से सर लगा कर के रोया

वो ख़त आख़िरी इक निशानी था जिसको
खुद अपने ही हाथों जला कर के रोया

उजालों में होजाती रुस्वाई उसकी
चिराग़ इस लिए वो बुझा कर के रोया

मिला मुद्दतों बाद वह रास्ते में
बहुत मुझसे शिकवा गिला कर के रोया

असीरी में होती अज़ीयत है कह कर
परिंदे वो सारे रिहा कर के रोया

लिखा था हथेली पे मेरा अभी नाम
वो हाथों में मेहंदी रचा कर के रोया

सजाये हंसी साद झूठी लबों पर
नज़र अपनी मुझसे बचा कर के रोया

अरशद साद रूदौलवी

         

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