लगा है जख़्म गहरा

गज़ल 1222×4
लगा है जख़्म गहरा दिल पे दिखलाया नहीं जाता।
इसे समझेगा क्या कोई ये समझाया नहीं जाता।

जमाने के सितम सह कर के पत्थर हो गये हैं हम,
खुशी के लाख हों मंजर, कि मुस्काया नहीं जाता।

तराने इश्क के कोई रहा गाता हो जीवन-भर,
मगर नाकाम उल्फ़त में तो इतराया नहीं जाता।

मसर्रत से भरा नगमा नहीं हमने कभी गाया,
जतन लाखों किये हमने मगर गाया नहीं जाता।

कभी आहें, कभी आँसू बने हैं उसकी किस्मत क्यूँ,
सता कर माँ, बहन, बेटी को इठलाया नहीं जाता।

नहीं महफ़ूज है अस्मत चमन में ‘राज’ औरत की,
समझ अबला उसे हरबार भरमाया नहीं जाता।
—-राजश्री—-

         

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