लड़खड़ाती जिंदगी…..

लड़खड़ाती जिंदगी, तन्हाइयाँ हंसती रहीं।
चंद माज़ी की मेरीे परछाइयाँ हंसती रहीं।

हसरतें फूलों सी हम दिल में बसाये थे मगर,
दिल में तेरी याद थी, रुसवाइयाँ हंसती रहीं।

होठों पर लेके हंसी और दर्द सीने में लिये,
होके बे गैरत मेरी मजबूरियाँ हंसती रहीं।

चन्द ख़वाबों के तसव्वुर नेबहुत हैरां किया
लब पे खामोशी रही पर सिसकियाँ हंसती रहीं।

जिंदगी रह गई तरसती रहनुमाई को मगर,
राहे-उल्फ़त में फक़त बदहवासियाँ हंसती रहीं।

वक्त ने बख़्शी हैं जब ये सिसकियों की सरगमें,
गीत गाती दर्द की अमराईयाँ हंसती रहीं।

कंपकपाते लब पे थीं अहसास की सच्चाईंयां
चश्म-नम में दूर तक खामोशियाँ हंसती रहीं।

रफ़्ता रफ़्ता बढ़ रहे थे हम उजालों की तरफ,
‘राज’ रौशन रूह की तारीकियाँ हंसती रहीं
—-राजश्री—-

         

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