“वो हो लेने दो”…

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मत टोकना , अश्क़ों से तकिया भिगो लेने दो ।
किसी की याद में ग़र खोते हैं तो खो लेने दो ।
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ये इंतज़ार के पल क्या लब पे हँसी देंगे ?
ग़र नहीं तो आज अब जी भर के रो लेने दो ।
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हो सकता है आगे चल अहसास मिले अच्छे ,
मगर अभी तो ये क़शिश का बीज बो लेने दो ।
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ग़र चारा नहीं कोई जलते रहने के सिवा ,
तो अब चाहे जो हो जाए वो हो लेने दो ।
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दिल लेकर मुफ़्त कहते हो ज़रा काम का नहीं ,
धड़कनों को ये बात आज जान तो लेने दो ।
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न जाने कौन गली ज़िंदगी की शाम हो जाए ?
इक पल स्याह ज़ुल्फ़ों की छाँव में सो लेने दो ।
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ग़मग़ीन चेहरा ज़हां को पसंद नहीं “कृष्णा”,
ये ग़म की निशानी को शकल से धो लेने दो ।
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— °•K.S. PATEL•°
( 26/06/2018 )

         

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