“समेट लूँ”…

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कभी लगता है अन्जाना सफ़र समेट लूँ ।
या फिर बिखरे ज़िंदगी का दफ़्तर समेट लूँ ।
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ग़म और खुशी का मिला-जुला प्रारूप इधर ,
दिल की तिजोरी में ज़रा मंज़र समेट लूँ ।
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आदत हो गयी है बुरी ख़बरें सुन-सुनकर ,
मिले कोई जो अच्छी-सी ख़बर समेट लूँ ।
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न जाने किधर-किधर चले गये घर के लोग ,
ज़ेहन में यादों का पूरा घर समेट लूँ ।
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मैं हमेशा अपनों में फूल बाँटता रहा ,
बदले में मिला वो सभी पत्थर समेट लूँ ।
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थी बेपनाह ख़्वाहिश , कुछ रह गयी अधूरी ,
आगे क्या , सब सीने के अंदर समेट लूँ ।
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“कृष्णा” की गल्तियों को सबने गिनाया ,
अगर दिख जाये तो कोई रबर समेट लूँ ।
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— °•K.S. PATEL•°
( 05/06/2018 )

         

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