सिर अगर भारी रखूँगा रो पड़ूँगा

सिर अगर भारी रखूँगा रो पड़ूँगा
ज़ख़्म कैसे भी भरूँगा रो पड़ूँगा।

मान ले बिन कुछ कहे मेरी कहानी
ज़िंदगी अब कुछ कहूँगा रो पड़ूँगा।

नाम किसने लिख दिया उसके बदन पर
नाम जिसका भी पढ़ूँगा रो पड़ूँगा।

मुझसे मेरे इश्क़ की दास्ताँ न पूछो
मैं बयाँ जैसे करूँगा.. रो पड़ूँगा।

हाँ! बहुत हारा हुआ आदम हूँ जाना
जान से जो मैं मरूँगा रो पड़ूँगा।

अश्क़ से लिपटा हुआ इक याद हूँ मैं
आह! से उसके डरूँगा रो पड़ूँगा।

छोड़कर जाते हुए उसने कहा था
दो क़दम भी मैं चलूँगा रो पड़ूँगा।

हिज्र ऐसी तोहमत है इश्क़ पर के
बेवफ़ाई तक सहूँगा रो पड़ूँगा।

और मुझको कौन सा ग़म हैं ज़ियादा
आँख में जिसके बसूँगा रो पड़ूँगा।

आज़माइश में मुहब्बत देख लेना
ख़ाक कर मैं ख़ुदको दूँगा रो पड़ूँगा।

मुश्क़ किसने यूँ पहन रक्खी थी वर्मा
ग़र बदन उसका बनूँगा रो पड़ूँगा।

         

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