“सोचने वाला नहीं कोई”…

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आज अश्क़ निकले तो पोंछने वाला नहीं कोई ?
ज़हन में रहें कैसे , सोचने वाला नहीं कोई ?
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वो याद आये तो जी से दुआ निकले है हरदम ,
मगर मुझको साँस तक छोड़ने वाला नहीं कोई ?
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बड़ा आसान है दिल में आना फिर चले जाना ,
कठिन सब कुछ भुलाना , रोकने वाला नहीं कोई ?
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अहसास और अश्क़ का तालमेल जमने लगा है ,
सोच पे लगा ताला , खोलने वाला नहीं कोई ?
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बाहर की हँसी न देखो , अंदर गहरे सन्नाटे ,
लगता है अब चुप्पी तोड़ने वाला नहीं कोई ?
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ये कैसा डर है मुहब्बत में हाथ मिलाते हुए ?
इक यार इस घड़ी में बोलने वाला नहीं कोई ?
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कुछ पल के लिये सही , अहसास चुराना ठीक लगा ,
विडंबना , अब कुछ भी चोरने वाला नहीं कोई ?
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पता नहीं ज़िंदगी की शाम अभी कैसी गुजरगी ?
उलझे हालत में अब टोकने वाला नहीं कोई ?
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दुनिया में इश्क़ की बसाहट हो , वो मंज़र न दिखा ,
देख “कृष्णा”  दिलों को जोड़ने वाला  नहीं कोई ?
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— °•K.S. PATEL•°
( 04/05/2018 )

         

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