ग़ज़ल-प्यार का दर्द

ग़ज़ल

आह…तिरा प्यार तो सितमगर है बहुत।

आह…तिरा प्यार तो सितमगर है बहुत।
शायद इस सरकार का असर है बहुत।

वादे बेबुनियाद तेरे हिलने लगे हैं अब,
किस पल पलट जाए ये डर है बहुत।

इस दिल की व्यथा को तुम क्या जानो,
हाँ अक्सर आप यहाँ बेखबर है बहुत।

हम बेहालात पर वैसे भी जख्म खा लिए,
और ऊपर से ये कातिल नज़र है बहुत।

अब काँटों की चूभन तो सुकून बक्से है,
नंगे पाँव चलने का ये सफर है बहुत।

दर्द से रूबरू हम आप से मिलकर हुए,
मरहम में तेरे सिवा अब बसर है बहुत।

“मुसाफिर” चल कहीं ओर सहारा ढूंढ़े,
इस जहां में गरीबों के घर है बहुत।

रोहताश वर्मा”मुसाफिर”
rkvthoughts.blogspot.com

         

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