ग़ज़ल


ग़मों के कब्र पे हँसता गुलाब दे जाओ
उदास रात है कोई तो ख्वाब दे जाओ

तुम्हीं को चाहा था, चाहा है, तुमको चाहूँगी
भले तू दर्द का लाखों हिजाब दे जाओ

रहा हूँ फिरता तुम्हारी तलाश में अब तक
सुकून देने को कोई ख़िताब दे जाओ

न कोई शिकवे-गिले हैं न आरजू दिल में
वजूद तेरा हो जिसमें किताब दे जाओ।

गुज़र रहे हैं जो दिन तेरे-मेरे फुरकत में
“स्वरा “जुदाई का अपने हिसाब दे जाओ।

         

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