ज़िंदगी इशक़ के जज़्बात से भर जाती है।

ज़िंदगी इशक़ के जज़्बात से भर जाती है।
जब तिरी याद मुझे छू के गुज़र जाती है।

गुल की मानिंद ही लगती है ये दो-रोज़ा हयात।
पहले खिलती महकती है बिखर जाती है।

कोई ख़ुशबू को कभी क़ैद नहीं कर पाया।
वो जिधर चाहे हवा ले के उधर जाती है।

जिस्म से रूह निकलती ही नहीं है क्योंकर
ज़िंदगी इतनी अज़ीयत से तो मर जाती है

अपने बाज़ू पे भरोसा जिसे होजाता है
ज़िंदगी उस की यक़ीनन ही सँवर जाती है

चीख़ मज़लूम की कानों से अगर टकराए
सूरत-ए-ज़ख़्म मरे दिल में उतर जाती है।

जब मुझे छोड़ के सब अपने चले जाते हैं
मेरी परछाई मरे साथ ठहर जाती है

ज़िंदगी दर्द का लिखती है कभी अफ़साना।
और कभी साद ग़ज़ल बनके निखर जाती है।

अरशद साद रूदौलवी

 

         

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