“अब ज़िद न करो”…

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जब आ ही गये हो तो जाने की अब ज़िद न करो ।
हम बुरे भी नहीं , आज़माने की अब ज़िद न करो ।
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तुम्हारी संगत से ही मोहक संगीत निकलता ,
सब पता है , कुछ और बताने की अब ज़िद न करो ।
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अज़ीब मगर सुंदर बिसात है , दोनों जीत रहे ,
किसी एक की भी मात खाने की अब ज़िद न करो ।
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दुनिया ने अब तक जितना भी सताया , क्या कम है ?
तुम तो इस कदर हमें सताने की अब ज़िद न करो ।
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हो जाता है कभी-कभार ज़िंदगी में नोंक-झोंक ,
समझो इसे फिर हमें भुलाने की अब ज़िद न करो ।
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कुछ बातें राज़ ही रहे तो बेहतर होता है ,
बिना वज़ह ये पर्दा हटाने की अब ज़िद न करो ।
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वो ख़त हमारी ज़िंदगी में उजाले का सबब है ,
किसी के डर से उसे जलाने की अब ज़िद न करो ।
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नये सफ़र में जब हम चलने लगे हैं साथ-साथ ,
सफ़र के दरम्यां , हाथ छुड़ाने की अब ज़िद न करो ।
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वफ़ा का ख़्वाब मुहब्बत के हीे सहारे है टिका ,
“कृष्णा” को और कुछ समझाने की अब ज़िद न करो ।
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— °•K.S. PATEL•°
( 05/02/2019 )

         

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